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What is Repo Rate and Reverse Repo Rate

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दोस्तों यदि हम स्पष्ट और आसान भाषा में बात करें , तो समय के साथ चीज़ों के दाम बढ़ते हैं। इसी दाम की बढ़त को ही हम inflation कहते हैं। Inflation in hindi means मुद्रास्फीति या मुद्राप्रसार। हम inflation को महंगाई भी कह सकते हैं।
Causes and factors affecting inflation in india 2020
शायद आपने भी अपने बड़ों को आज के दामों और पहले के दामों में तुलना करते हुए सुना होगा। मेरे बड़े भी मुझे बताते हैं कि उनके जमाने में ₹10 में ही वे पूरा मेला घूम आते थे और बुजुर्गों की छोड़िये , मैंने तो खुद ने अपने बचपन में यह महसूस किया है और जो उदाहरण माइआ देने जा रहा हूँ वह शायद आपने भी देखा होग। मैं बचपन में समोसे बहुत खाता था उस वक्त उसकी कीमत ₹5 थी किंतु आज यदि मैं वही समोसा उसी दुकान पर जाकर खाऊं तो मुझे आज उसके लिए ₹10 देने होंगे और कुछ समय बाद वही समोसा ₹20 के नीचे नहीं मिलेगा।
तो आप यहां समझ सकते हैं की चीज तो वही है किंतु समय के साथ उसी चीज के लिए हमें ज्यादा पैसे देने होंगे। जो चीज हम पहले एक रुपए में खरीद सकते थे वह आज नहीं खरीद सकते। इसका मतलब यह हुआ कि समय के साथ रुपए की खरीदी करने की क्षमता कम हो गई है और इसी को हम इन्फ्लेशन या मुद्रास्फीति भी कहते हैं ,और एक दिए गए समय में जितना फीसदी inflation होता है , उसे हम इन्फ्लेशन रेट यानी कि मुद्रास्फीति दर कहते हैं। तो चलिए आइए अब हम देखते हैं कि पूरे देश का इन्फ्लेशन रेट कैसे मापा जाता है।

How to calculate inflation in india (भारत में मुद्रास्फीति की गणना कैसे करें)

यदि हम किसी एक वस्तु की बात करें जैसे कि एक लैपटॉप की जिसका दाम 1 साल में ₹30000 से ₹32000 हो गया तब हम ये बता सकते हैं कि लैपटॉप का दाम ₹2000 बढ़ा है। इस संदर्भ में मुद्रास्फीति दर यानी कि इन्फ्लेशन रेट 6.6% है किंतु यह जरूरी नहीं है कि देश की सभी वस्तुओं एवं सेवाओं (जैसे कि बस का किराया, फलों के दाम ,राशन के दाम इत्यादि )के भाव इसी दर से बढ़े , बल्कि ऐसा कभी देखने को मिलता भी नहीं है। असलियत में तो हर देश की अलग-अलग चीजों के दाम अलग -अलग रेट से ही बढ़ते हैं और ऐसा जरूरी भी नहीं है कि हर एक वस्तु का दाम बढ़ना ही चाहिए ,हो सकता है कि किसी चीज का दाम बढ़ा ही ना हो और क्या पता कुछ चीजों के दाम कम भी हुए हों ,जिसको कोई भी कारण हो सकता है।यहां पर दोस्तों हमें इन्फ्लेशन के साथ deflation (अपस्फीति) का मतलब भी सीख लेना चाहिए। जब किसी देश में इन्फ्लेशन रेट यानी की मुद्रास्फीति दर नेगेटिव में चली जाए यानी के दाम बढ़ने की बजाये घटने लगे तो हम इसे deflation (अपस्फीति) का नाम देते है।
तो पूरे देश का एक सापेक्ष इन्फ्लेशन रेट भी होना जरूरी है जिससे कि सरकारें अपनी नीतियां बना सकें लेकिन सरकारें एक इन्फ्लेशन रेट पूरे देश के लिए कैसे बता सकते हैं ?आखिर कैसे देश की सरकारें हर साल पूरे देश का इन्फ्लेशन रेट बताती हैं अब हम इस अनुच्छेद में यही जानेंगे ।

Who measures Inflation in India (भारत में मुद्रास्फीति को कौन मापता है)?

मुद्रास्फीति को एक केंद्र सरकार के प्राधिकारी द्वारा मापा जाता है, जो अर्थव्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिए उपाय अपनाने के प्रभारी हैं। भारत में, सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (Ministry of Statistics and Programme Implementation) मुद्रास्फीति को मापता है।
भारत में, मुद्रास्फीति को मुख्य रूप से दो मुख्य सूचकांकों - WPI (Wholesale Price Index /थोक मूल्य सूचकांक) और CPI ( Consumer Price Index /उपभोक्ता मूल्य सूचकांक) द्वारा मापा जाता है, जो क्रमशः थोक(Wholesale ) और खुदरा स्तर(retail-level) के मूल्य परिवर्तनों को मापते हैं। CPI खाद्य, चिकित्सा देखभाल, शिक्षा, इलेक्ट्रॉनिक्स आदि जैसी वस्तुओं और सेवाओं की कीमत में अंतर की गणना करता है, जिसे भारतीय उपभोक्ता उपयोग के लिए खरीदते हैं।
दूसरी ओर, व्यवसायों(businesses) द्वारा बिक्री के लिए छोटे व्यवसायों को बेची जाने वाली वस्तुओं या सेवाओं को WPI द्वारा देखा जाता है। भारत में, मुद्रास्फीति को मापने के लिए WPI (थोक मूल्य सूचकांक) और CPI (उपभोक्ता मूल्य सूचकांक) दोनों का उपयोग किया जाता है।
Causes and factors affecting inflation in india 2020
WPI इंडेक्स थोक बाजार में खरीदे और बेचे जाने वाले सामानों के औसत मूल्य परिवर्तन को दर्शाता है। भारत में WPI को वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय के आर्थिक सलाहकार के कार्यालय (Office of Economic Adviser, Ministry of Commerce and Industry)द्वारा प्रकाशित किया जाता है।
एक महत्वपूर्ण बिंदु यह है कि पूरे बिक्री मूल्य सूचकांक (WPI) केवल थोक बाजार के मूल्य स्तर में बदलाव को ही दर्शाता है, यह अंतिम उपभोक्ता द्वारा वहन किए जाने वाले वास्तविक बोझ का संचार करने में विफल रहता है। WPI केवल एक प्राथमिक उपाय है जो भारतीय केंद्र सरकार द्वारा मुद्रास्फीति का पता लगाने के लिए उपयोग किया जाता है । WPI की इस कमी को CPI (उपभोक्ता मूल्य सूचकांक) पूरा कर देता है क्योंकि वह खुदरा बाजार में होने वाले दामों के बदलाव को दर्शाता है जिसका उपभोक्ता से सीधा नाता है ।

Types of Inflation(मुद्रास्फीति के तीन प्रकार)

दोस्तों पूरी economics (अर्थ-व्यवस्था ) demand और supply पर टिकी है। यही कहानी ही इधर है। तो चलिए देखते है।

1) Demand Pull Inflation (मांग जन्य मुद्रास्फीति):

Demand-pull inflation में supply तो उतनी ही रहती है जितनी होनी चाहिए किन्तु अब demand कम हो जाती है। जब किसी चीज़ की डिमांड यानि के मांग घट जाती है तो उसकी बिक्री में गिरावट आएगी जिसकी वजह से वह चीज़ सस्ते दाम पर बेचनी पड़ेगी। इसका उदहारण भी हम सब्जिओं से ही दे देते हैं। कोरोना के समय भारत के गरीब लोगों के पास पैसों की तंगी आ गयी , जिसकी वजह से बहुत कम सब्जिओं के साथ गुजरा करना शुरू कर दिया। सलाद और सब्जी लोग कम खरीदने लगे तो दिल्ली में टमाटर 3रुपये /किलो के भाव से बिक रहे थे।
तो यहां से हम यह निष्कर्ष निकल सकते हैं की Demand-pull inflation से दामों में गिरावट आती है। इस तरीके की इन्फ्लेशन को हम deflation भी कह देते हैं।

2)Cost Push Inflation(लागतजन्य स्फीति):

जब देश में demand की दर उतनी ही रहती है जितनी आमतौर पर होती है किन्तु किसी चीज़ की सप्लाई कम हो जाए (यह किन्ही भी कारणों से हो सकती है जैसे की कच्चे माल मई कमी आना , मजदूरों की हड़ताल इत्यादि )तो इसे हम Cost-Push Inflation कहते हैं। जब देश में किसी चीज़ की सप्लाई में कमी आ जाती है तो उस चीज़ के लिए लोग ज्यादा दाम भी देने को भी त्यार हो जाते हैं , और यदि वह चीज़ ज्यादा ही जरूरी हो तो उसकी कीमत और ज्यादा बढ़ती है। इसका एक बहुत अच्छा उदहारण है वो समय जब भारत में प्याज़ जैसी चीज़ों के दाम आसमान छू लेते हैं।
तो यहां से हम यह निष्कर्ष निकल सकते हैं की cost-push inflation से दामों में तेजी आती है।
Causes and factors affecting inflation in india 2020

What are the effects of Inflation(मुद्रास्फीति के प्रभाव क्या हैं)?

अब तक तोआप ही समझ ही गए होंगे की इन्फ्लेशन क्या है। अब हमें यह समझने की जरूरत है कि अलग-अलग लोगों पर इन्फ्लेशन यानी के मुद्रास्फीति के क्या प्रभाव हैं। क्या यह हमारे लिए फायदेमंद भी हो सकती है ?देखिए अब तक आपने बस यही समझा है कि मुद्रास्फीति के बढ़ने का मतलब महंगाई में तेजी आना है, किंतु यह जरूरी नहीं है की हर किसी के लिए मुद्रास्फीति एक समान काम कर। किसी को मुद्रास्फीति से लाभ हो सकता है और किसी को नुकसान भी। एक ही व्यक्ति को किसी एक कार्य में मुद्रास्फीति के कारण फायदा हो सकता है ,मुनाफा हो सकता है और वही किसी दूसरे तरीके से मुद्रास्फीति उसी व्यक्ति का नुकसान भी कर सकती है। तो हमें यह समझना होगा की इन्फ्लेशन लोगों की जिंदगी पर और बाकी देश की अर्थव्यवस्था के पहलुओं पर क्या प्रभाव डालती है। तो चलिए देखते हैं और समझते हैं inflation के प्रभावों को।

1) Effects of Inflation on Distribution of Income and Wealth of people(लोगों के आय और धन के वितरण पर मुद्रास्फीति के प्रभाव)

मुद्रास्फीति का प्रभाव राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के भीतर व्यक्तियों के विभिन्न समूहों द्वारा असमान रूप से महसूस किया जाता है - कुछ लोगों का समूह बड़ा भाग्य बनाकर लाभ उठाता है और कुछ अन्य इसके आगे हार जाते हैं। •

Producers and workers(निर्माता और श्रमिक):

उत्पादकों को लाभ होता है क्योंकि उन्हें उच्च कीमत मिलती है और इस प्रकार अपने उत्पादों की बिक्री से अधिक लाभ होता है। जैसा कि कीमतों में वृद्धि आम तौर पर उनकी लागत में वृद्धि से अधिक होती है, निर्माता मुद्रास्फीति के दौरान अधिक कमा सकते हैं। श्रमिकों और मजदूरों का इन्फ्लेशन के बढ़ने से नुकसान हो सकता है क्योंकि आमतौर पर यह देखा जाता है कि जिस दर से देश में महंगाई बढ़ती है ,उस दर से उनकी ध्याड़ी नहीं बढ़ती। ऐसे में उनकी असल कमाई कम हो जाती है और उन्हें महंगाई की मार सहनी पड़ती है। हालांकि उनके किए गए काम द्वारा उनके मालिकों को अधिक मुनाफा हो सकता ह। •

Fixed income-earners(निश्चित आय कमाने वाले):

वेतनभोगी लोगों, किराया-कमाने वाले, जमींदारों, पेंशनरों, आदि जैसे निश्चित आय-प्राप्तकर्ताओं को बहुत नुकसान होता है क्योंकि मुद्रास्फीति उनकी कमाई के मूल्य को कम करती है ,जैसा कि हमने ऊपर श्रमिकों के संदर्भ में पढ़ा । •

Investors(निवेशक):

निवेशकों का मुनाफा या घटा इस बात पर निर्भर करता है कि वह किस चीज में निवेश करते हैं। जैसे कि यदि हम बात करें equity / share market की, तो वहां आमतौर पर इन्फ्लेशन की वजह से कंपनियों को फायदा होता है जिससे कि निवेशक को भी होग। लेकिन यदि हम बात करें bond holders (बॉन्ड धारक) की ,तो यहां उनका थोड़ा घाटा होता है क्योंकि उन्हें बॉन्ड पर एक पहले से निश्चित किया गया ब्याज ही मिलेगा पर महंगाई तो समय के साथ बढ़ रही है । •

Creditors and debtors(लेनदारों और देनदारों):

यदि हम बात करें लेनदारों और देनदारों की तो यहां हम यह कह सकते हैं कि इन्फ्लेशन से पैसे लेने वाले को कुछ नुकसान हो सकता है क्योंकि जैसे समय बढ़ता है ,तो समय के साथ पैसे की वैल्यू (कीमत )घटती है। यदि वह पैसा कुछ समय पहले मिलता तो उसके लिए वही रकम ज्यादा मायने रखती। यदि आपने किसी को पैसे लोन कर भी दिए हैं yani ब्याज पर भी दिए हैं और जो ब्याज आप प्राप्त करते हैं वह इन्फ्लेशन रेट से कम है ,तब भी आपको आपके असल मुनाफे से तो कम ही मिलेगा। इसीलिए बैंक जो आपको लोन देते हैं उनकी ब्याज दर हमेशा इन्फ्लेशन रेट से ज्यादा ही होती है ताकि उन्हें कभी भी नुकसान न झेलना पड़े

Traders, speculators, businesspeople and black-marketers(व्यापारी, सट्टेबाज, व्यापारी और कालाबाजारी करने वाले):

ऐसे लोग inflation के बढ़ने से लाभ ही प्राप्त करते हैं क्योंकि वे कीमतों में लगातार वृद्धि से अधिक लाभ कमाते हैं।
Causes and factors affecting inflation in india 2020

2) Effects on Production(उत्पादन पर प्रभाव):

बढ़ती कीमतें सभी वस्तुओं के उत्पादन को प्रोत्साहित करती हैं - खपत और पूंजीगत सामान दोनों। जैसा कि उत्पादकों को अधिक से अधिक लाभ मिलता है, वे अपने सभी उपलब्ध संसाधनों का उपयोग करके अधिक से अधिक उत्पादन करने का प्रयास करते हैं।
लेकिन, पूर्ण रोजगार के चरण के बाद यानि के वे और श्रमिकों भर्ती नहीं क्र सकते,तब उत्पादन में वृद्धि नहीं हो सकती क्योंकि सभी संसाधन पूरी तरह से नियोजित (इस्तेमाल ) हो चुके हैं। इसके अलावा, उत्पादकों और किसानों ने कीमतों में और वृद्धि की उम्मीद में अपने स्टॉक में वृद्धि की। परिणामस्वरूप वस्तुओं की जमाखोरी और जमाव बढ़ेगा।
लेकिन उत्पादन पर मुद्रास्फीति के ऐसे अनुकूल प्रभाव हमेशा नहीं पाए जाते हैं। कभी-कभी बढ़ती कीमतों के बावजूद उत्पादन एक ठहराव की स्थिति में आ सकता है, जैसा कि हाल के वर्षों में भारत, थाईलैंड और बांग्लादेश जैसे विकासशील देशों में पाया गया। इस स्थिति को stagflation ( स्टैगफ्लेशन )के रूप में वर्णित किया जाता है।

2) Effects on Business and Trade (व्यापार और व्यापार पर प्रभाव):

Lower exports
आय वृद्धि , अधिक उत्पादन और बड़े खर्च के कारण मुद्रास्फीति के दौरान आंतरिक व्यापार की कुल मात्रा बढ़ती है। लेकिन घरेलू वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि के कारण निर्यात व्यापार को नुकसान होने की संभावना है क्योंकि जब कीमते बढ़ेंगी तो बहार के देशों को उसकी ज्यादा कीमत देनी पड़ेगी ,जिसके कारण वे अपने आयत में कमी लाने की कोशिश करेंगे । हालांकि, व्यावसायिक फर्मों ने अपने कारोबार का विस्तार बड़े लाभ कमाने के लिए किया।

Higher interest rates(अधिक ब्याज दर):

Causes and factors affecting inflation in india 2020

मुद्रास्फीति लंबे समय में उच्च ब्याज दरों की ओर ले जाती है। प्रारंभ में जब सरकार मुद्रा आपूर्ति बढ़ाती है, तो धन की बढ़ी हुई उपलब्धता ब्याज दरों को कम कर सकती है। हालांकि, उच्चतर संतुलन मूल्य और पैसे की कम कीमत के कारण बढ़ी हुई money supply (धन आपूर्ति )के कारण बैंकों और अन्य वित्तीय संस्थानों को अपने धन की purchasing power(क्रय शक्ति )के नुकसान की भरपाई करने के लिए दरों में वृद्धि होती है। उच्च दीर्घकालिक दरें व्यावसायिक उधार को हतोत्साहित करती हैं, जिससे पूंजीगत वस्तुओं और प्रौद्योगिकी में कम निवेश होता है।

lower savings (कम बचत):

मुद्रास्फीति बचत के बजाय खपत को प्रोत्साहित करती है। उच्च कीमतें लोगों को अधिक उत्पाद खरीदने के लिए प्रेरित करती हैं, इससे पहले कि वे अधिक महंगे हो जाएं। वे लोगों को बचत से हतोत्साहित करते हैं, क्योंकि भविष्य के उपयोग के लिए बचाए गए धन का कम मूल्य होगा। वित्तीय बाजारों में धन बढ़ाने के लिए बचत की आवश्यकता होती है। यह व्यवसायों को पूंजीगत वस्तुओं और प्रौद्योगिकी में निवेश के लिए धन उधार लेने की अनुमति देता है। प्रौद्योगिकी और पूंजीगत वस्तुओं में वृद्धि लंबे समय तक आर्थिक विकास का निर्माण करती है। मुद्रास्फीति बढ़ने से खपत बढ़ती है, जो बचत को हतोत्साहित करती है और आर्थिक विकास को धीमा कर देती है।

Inefficient government spending(अक्षम सरकारी खर्च):

जब सरकार नए मुद्रित धन के उपयोग के माध्यम से अपने खर्चों को पूरा करती है, तो यह Federal Reserve system द्वारा अतिरिक्त रूप से मुद्रित धन से किए गए मुनाफे को इकट्ठा करके इन funds (निधियों ) को प्राप्त करती है। अनुभव से पता चलता है कि मुफ्त में अर्जित धन उतना ध्यान से और कुशलता से खर्च नहीं किया जाता जितना कि अधिक बलिदान के माध्यम से प्राप्त धन। जब सरकार करों को बढ़ाकर धन प्राप्त करती है, तो कुछ हद तक जवाबदेही होती है। जब सरकार नए मुद्रित पैसे के माध्यम से धन प्राप्त करती है, तब तक कोई जवाबदेही नहीं होती है, जब तक कि नागरिक मुद्रास्फीति के वास्तविक कारण से अवगत नहीं हो जाते हैं।
यह बात ध्यान में रखें की सरकार ज्यादा पैसा भी नहीं छाप सकती ,क्योंकि जब वे ऐसा करेंगी तो devaluation of rupee होने के चांस है। इससे देश में पैसे की supply भी बढ़ती है जिससे लोगों के पास ज्यादा पैसा आएगा और ज्यादा खर्च करेंग। जब वे ज्यादा खर्च करेंगे तो इसका मतलब demand बढ़ी है और जब demand बढ़ती है तो दाम भी बढ़ेंगे जिसे हम demand pull inflation भी कहते हैं।

Tax increases(टैक्स बढ़ जाता है):

अधिक कीमतों से करों में वृद्धि होती है। नाममात्र (वास्तविक नहीं) आय मुद्रास्फीति के साथ बढ़ती है और आय प्राप्तकर्ताओं को उच्च प्रतिशत कर ब्रैकेट में धकेल देती है। भले ही क्रय शक्ति में वृद्धि न हो, लेकिन एक व्यक्ति सरकार को अपनी आय का एक बड़ा हिस्सा देता है। मकान, जमीन और अन्य अचल संपत्ति पर संपत्ति कर, वृद्धि, साथ ही। यदि सरकार मुद्रास्फीति की दर के साथ कोष्ठक को समायोजित करती है, तो कर दरें समान रहेंगी; हालाँकि, कई बार सरकार कोष्ठक को समायोजित नहीं करती है, या उन्हें पूरी तरह से समायोजित नहीं करती है। इसके बाद उच्च कर की दर बढ़ेगी।
Causes and factors affecting inflation in india 2020

What are factors affecting Inflation(मुद्रास्फीति को प्रभावित करने वाले कारक हैं)?

Causes and factors affecting inflation in india 2020

1)Hoarding(जमाखोरी):

जब आप मुद्रास्फीति के कारणों का अध्ययन करेंगे, तो आपको यह शब्द बहुत कम दिखाई देगा, लेकिन जमाखोरी के कारण कीमतों में वृद्धि हो सकती है। किसी भी वस्तु का स्टॉक जमा होना और कृत्रिम रूप से इसे बनाना, बाजार में कमी और उन्हें बेचने के बजाय जब कीमतें बढ़ती हैं। कमी के लिए। शायद आप हमारे देश में प्याज की कीमतों में बढ़ोतरी को याद कर सकते हैं, होर्डर्स भी इस प्रकार के मूल्य वृद्धि में योगदान करते हैं, हालांकि यह गतिविधि गलत है।

Money Supply(पैसे की आपूर्ति ):

अर्थव्यवस्था में धन की आपूर्ति में वृद्धि, धन वृद्धि का प्रचलन, लोगों के पास खर्च करने के लिए अधिक धन है और वृद्धि की मांग में परिणाम खरीदने का यह सकारात्मक दृष्टिकोण।
NOTE : जब सरकार कुल कर संग्रह या सरकारी राजस्व की तुलना में अधिक पैसा खर्च करती है, तो सरकार को घाटे का वित्तपोषण करने और इसे दूर करने के लिए सरकार, या तो अधिक पैसा या अवमूल्यन / डिबेट (अन्य मुद्राओं के संबंध में मुद्रा के मूल्य को कम करने के लिए) को मुद्रित करता है।

Foreign Trade(विदेशी व्यापार):

विदेशी व्यापार भी मुद्रास्फीति को प्रभावित कर सकता है। देश की कुल उत्पादन घरेलू और विदेशी मांग को पूरा करने के लिए पर्याप्त होना चाहिए। यदि अर्थव्यवस्था इसमें विफल रहती है, तो इसका परिणाम मुद्रास्फीति होता है।

Increase in Public Spending (सार्वजनिक व्यय में वृद्धि):

किसी भी आधुनिक अर्थव्यवस्था में, सरकारी खर्च कुल खर्च का एक महत्वपूर्ण तत्व है। यह (aggregate demand)समग्र मांग का एक महत्वपूर्ण निर्धारक भी है।
आमतौर पर, कम विकसित अर्थव्यवस्थाओं में, सरकार का खर्च बढ़ जाता है जो हमेशा अर्थव्यवस्था पर मुद्रास्फीति का दबाव बनाता है।

Deficit Financing of Government Spending(सरकार द्वारा ज्यादा खर्च):

दोस्तों कई बार ऐसा समय भी आ जाता है जब सरकार अपने टैक्स रेवेन्यू से कमाए गए पैसे से ज्यादा खर्च कर देती हैं (यह खर्च किसी भी काम के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है जैसे कि सरकार की कोई नई स्कीम ,पेंशन भत्ता ,इत्यादि )। जब सरकार अपनी कमाई से ज्यादा खर्च करती है तो उस खर्च को चलाने के लिए उसे और पैसा छापना पड़ेगा या लोन लेना पड़ेग। यदि सरकार ज्यादा पैसे छाप देती हैं तो मार्केट में मनी सप्लाई बढ़ जाती है और ज्यादा खर्च से इन्फ्लेशनरी प्रेशर (मुद्रास्फीति बढ़ने का दबाव ) भी बढ़ता है ।

Increased Velocity of Circulation of money (धन के प्रसार के वेग में वृद्धि):

एक अर्थव्यवस्था में हम धन का कुल उपयोग ऐसे निकलते हैं :
धन का कुल उपयोग= (सरकार द्वारा धन की आपूर्ति )x (धन के संचलन का वेग)
total use of money = the money supply by the Government x the velocity of circulation of money
जब एक अर्थव्यवस्था तेजी के दौर से गुजर रही होती है, तो लोग पैसे के प्रचलन के वेग को बढ़ाते हुए तेज दर से पैसा खर्च करते हैं और इसके नतीजे आप जानते ही हैं ।

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